Putrda Ekadashi Vrat Katha हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखती है। पौष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पुत्रदा एकादशी कहा जाता है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और विश्वास के साथ भगवान विष्णु की पूजा और व्रत करने से संतान सुख की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि संतान की इच्छा रखने वाले दंपति इस दिन पूरे विधि-विधान से व्रत करते हैं और कथा का श्रवण करते हैं।
धर्म ग्रंथों के अनुसार, Putrda Ekadashi Vrat Katha सुनने मात्र से ही पुण्य की प्राप्ति होती है। यह व्रत न सिर्फ संतान सुख देता है, बल्कि परिवार में सुख-शांति और समृद्धि भी लेकर आता है। ROZ KI BAAT के इस लेख में हम आपको पुत्रदा एकादशी की कथा, इसका महत्व और इससे मिलने वाले लाभ आसान शब्दों में बता रहे हैं।

पुत्रदा एकादशी क्यों है खास?
पुत्रदा एकादशी का उल्लेख कई धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं अर्जुन को इस व्रत का महत्व बताया था। मान्यता है कि जो व्यक्ति संतानहीन होता है और वह पूरे नियम से पुत्रदा एकादशी का व्रत करता है, उसे अवश्य संतान की प्राप्ति होती है।
Putrda Ekadashi Vrat Katha बताती है कि यह व्रत पूर्व जन्म के पापों को नष्ट करता है और पितृ दोष से भी मुक्ति दिलाता है। यही कारण है कि इस एकादशी को संतान देने वाली एकादशी कहा गया है।
Putrda Ekadashi Vrat Katha: जानें पूरी पौराणिक कथा
प्राचीन समय की बात है। भद्रावती नाम के एक सुंदर राज्य में सुकेतुमान नाम का राजा राज्य करता था। राजा बहुत धर्मात्मा और न्यायप्रिय था। उसकी पत्नी का नाम शैव्या था। राजा के पास धन, वैभव और सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी, लेकिन एक चीज़ की कमी उसे हमेशा परेशान करती थी, और वह थी संतान का अभाव।
राजा को यह चिंता सताती रहती थी कि उसके बाद उसके पितरों का श्राद्ध और पिंडदान कौन करेगा। यही सोचते-सोचते वह दिन-रात दुखी रहने लगा। एक दिन अत्यधिक निराश होकर राजा वन की ओर निकल गया।
जंगल में राजा को मिला समाधान
वन में घूमते समय राजा ने देखा कि पशु-पक्षी भी अपने परिवार के साथ खुश हैं। यह देखकर राजा का मन और अधिक दुखी हो गया। कुछ देर बाद उसे प्यास लगी और वह जल की खोज में आगे बढ़ा। तभी उसे एक सुंदर सरोवर दिखाई दिया, जिसके चारों ओर कई ऋषियों के आश्रम बने हुए थे।
राजा घोड़े से उतरकर ऋषियों को प्रणाम करता है और अपनी पूरी व्यथा उन्हें सुनाता है। राजा की बात सुनकर ऋषियों ने कहा कि आज पौष मास की पुत्रदा एकादशी है। यदि राजा विधि-विधान से इस व्रत को करे और Putrda Ekadashi Vrat Katha का श्रवण करे, तो उसकी मनोकामना अवश्य पूरी होगी।
व्रत के प्रभाव से मिला संतान सुख
ऋषियों की बात मानकर राजा ने पुत्रदा एकादशी का व्रत पूरे श्रद्धा भाव से किया। उसने भगवान विष्णु की पूजा की, रात्रि जागरण किया और द्वादशी तिथि को विधिवत पारण किया। इस व्रत के प्रभाव से कुछ समय बाद रानी शैव्या ने गर्भ धारण किया।
नौ महीने बाद रानी ने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। यह बालक आगे चलकर एक यशस्वी और धर्मपरायण राजा बना। तभी से यह मान्यता प्रचलित हुई कि Putrda Ekadashi Vrat Katha सुनने और व्रत करने से संतान सुख की प्राप्ति होती है।
पुत्रदा एकादशी व्रत करने की विधि
अगर आप Putrda Ekadashi Vrat Katha का पूरा फल पाना चाहते हैं, तो व्रत की सही विधि अपनाना जरूरी है:
- सुबह जल्दी उठकर स्नान करें
- स्वच्छ कपड़े पहनें
- भगवान विष्णु की पूजा करें
- तुलसी दल, पीले फूल और फल अर्पित करें
- “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करें
- दिनभर उपवास रखें
- रात्रि में जागरण करें
- द्वादशी के दिन पारण करें
Putrda Ekadashi Vrat Katha सुनने के लाभ
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार Putrda Ekadashi Vrat Katha सुनने से कई लाभ मिलते हैं:
- संतान प्राप्ति की इच्छा पूरी होती है
- संतान का स्वास्थ्य अच्छा रहता है
- परिवार में सुख-शांति बनी रहती है
- पितृ दोष से मुक्ति मिलती है
- जीवन में सकारात्मकता आती है
ROZ KI BAAT मानता है कि इस व्रत का सबसे बड़ा लाभ मन की शांति और विश्वास है।
आज के समय में पुत्रदा एकादशी का महत्व
आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में जब लोग तनाव और चिंता से घिरे रहते हैं, ऐसे में Putrda Ekadashi Vrat Katha आस्था का सहारा बनती है। यह व्रत हमें धैर्य, विश्वास और ईश्वर की भक्ति का महत्व समझाता है।
निष्कर्ष
Putrda Ekadashi Vrat Katha यह संदेश देती है कि सच्चे मन और श्रद्धा से किया गया व्रत कभी निष्फल नहीं जाता। जो भी व्यक्ति इस दिन भगवान विष्णु की पूजा करता है और कथा का श्रवण करता है, उसकी मनोकामना अवश्य पूरी होती है। संतान सुख की कामना रखने वालों के लिए यह व्रत बेहद फलदायी माना गया है।
Disclaimer
इस लेख में दी गई जानकारी धर्म ग्रंथों, मान्यताओं और विद्वानों पर आधारित है। ROZ KI BAAT केवल जानकारी देने का माध्यम है। पाठक इसे सामान्य सूचना के रूप में लें।