Khar Maas Ki Katha: हिंदू धर्म में खर मास का विशेष महत्व बताया गया है। हर साल एक निश्चित समय पर खर मास आता है, जिसमें कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता। धर्म ग्रंथों के अनुसार खर मास हर साल 16 दिसंबर से 14 जनवरी तक रहता है।
हालांकि, अधिकतर लोगों को यह तो पता होता है कि खर मास में शादी-ब्याह जैसे कार्य नहीं होते, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि आखिर इस महीने को खर मास क्यों कहा जाता है। इसके पीछे एक रोचक पौराणिक कथा भी है। ROZ KI BAAT में आगे जानिए Khar Maas Ki Katha विस्तार से।

Khar Maas Katha In Hindi: खर मास कब लगता है
धर्म ग्रंथों और ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जब भी सूर्यदेव गुरु ग्रह की राशि यानी धनु या मीन राशि में प्रवेश करते हैं, तब उस समय को खर मास कहा जाता है।
यह स्थिति साल में दो बार बनती है। एक बार दिसंबर के महीने में और दूसरी बार मार्च के आसपास। इस बार खर मास 16 दिसंबर 2025 से शुरू होकर 13 जनवरी 2026 तक रहेगा।
इस पूरे समय को शुभ कार्यों के लिए वर्जित माना गया है, लेकिन पूजा-पाठ, दान और तपस्या के लिए यह समय बहुत उत्तम माना जाता है।
खर मास से जुड़ी पौराणिक कथा (Khar Maas Ki Katha)
Khar Maas Ki Katha का उल्लेख मार्कंडेय पुराण में मिलता है। कथा के अनुसार सूर्यदेव के रथ में कुल सात घोड़े जुड़े रहते हैं। ये सातों घोड़े बिना रुके चलते रहते हैं और समय के प्रवाह का प्रतीक माने जाते हैं।
एक बार ऐसा हुआ कि लगातार यात्रा करने के कारण सूर्यदेव के घोड़े बहुत अधिक थक गए। सूर्यदेव से अपने घोड़ों की यह हालत देखी नहीं गई। तब उन्होंने एक तालाब के पास रथ रोककर घोड़ों को पानी पिलाया और उन्हें आराम दिया।
सूर्यदेव की मजबूरी बनी कारण
हालांकि सूर्यदेव के लिए पूरी तरह रुकना संभव नहीं था, क्योंकि सूर्य का रुकना पूरी सृष्टि के लिए संकट पैदा कर सकता था। लेकिन थके हुए घोड़ों को रथ में जोतना भी उचित नहीं था।
इसी दौरान सूर्यदेव की नजर तालाब के पास खड़े दो गधों पर पड़ी। स्थिति को समझते हुए सूर्यदेव ने उन गधों को अपने रथ में जोत लिया और आगे की यात्रा शुरू कर दी।
एक महीने तक गधों से चला सूर्यदेव का रथ
सूर्यदेव ने पूरे एक माह तक गधों के सहारे अपनी यात्रा पूरी की। एक महीने के बाद जब सूर्यदेव दोबारा उसी स्थान पर पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि उनके घोड़े पूरी तरह स्वस्थ हो चुके हैं और यात्रा के लिए तैयार हैं।
इसके बाद सूर्यदेव ने गधों को रथ से अलग कर दिया और अपने घोड़ों को पुनः रथ में जोत लिया। यह पूरी घटना उस समय घटी जब सूर्यदेव धनु राशि में विराजमान थे।
‘खर’ शब्द का अर्थ क्या है?
धर्म ग्रंथों में गधे को ‘खर’ भी कहा जाता है। चूंकि सूर्यदेव ने धनु राशि में रहते हुए एक महीने तक गधों यानी खर के सहारे यात्रा की थी, इसलिए उस महीने को खर मास कहा जाने लगा।
तभी से यह मान्यता बन गई कि जब भी सूर्यदेव धनु राशि में प्रवेश करते हैं, उस अवधि को खर मास कहा जाता है।
खर मास में क्यों नहीं किए जाते शुभ कार्य
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार खर मास के दौरान विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, नामकरण जैसे शुभ कार्य नहीं किए जाते। ऐसा माना जाता है कि इस समय सूर्यदेव की ऊर्जा सामान्य रूप से प्रभावी नहीं रहती, इसलिए शुभ कार्यों का फल नहीं मिलता।
हालांकि इस दौरान
- भगवान विष्णु की पूजा
- सूर्यदेव की उपासना
- दान-पुण्य
- व्रत और जप
को बहुत शुभ माना गया है।
खर मास का आध्यात्मिक महत्व
Khar Maas Ki Katha हमें यह सिखाती है कि जीवन में हर समय बाहरी कार्य ही जरूरी नहीं होते। कभी-कभी रुककर आत्मिक शुद्धि और भक्ति करना भी आवश्यक होता है।
इसी कारण संत और विद्वान इस महीने को आत्मचिंतन, साधना और ईश्वर भक्ति के लिए उत्तम मानते हैं।
निष्कर्ष
खर मास को सिर्फ अशुभ समय मानना सही नहीं है। यह महीना भक्ति, संयम और धार्मिक कार्यों के लिए विशेष माना गया है। Khar Maas Ki Katha सूर्यदेव के रथ से जुड़ी एक ऐसी रोचक कथा है, जो इस महीने के नाम और महत्व को स्पष्ट करती है।
ROZ KI BAAT के इस लेख में आपने जाना कि खर मास क्यों लगता है, ‘खर’ का क्या अर्थ है और इसके पीछे की पौराणिक कहानी क्या है।
Disclaimer
इस आर्टिकल में दी गई जानकारी धर्म ग्रंथों, विद्वानों और ज्योतिषियों से ली गई है। ROZ KI BAAT केवल इस जानकारी को आप तक पहुंचाने का माध्यम है। यूजर्स इन जानकारियों को सिर्फ सूचना ही मानें।