Saphala Ekadashi Vrat Katha का विशेष महत्व पौष मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को माना गया है। हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार इस एकादशी को करने और इसकी कथा सुनने से व्यक्ति को विशेष पुण्य फल प्राप्त होता है। इस बार सफला एकादशी का व्रत 15 दिसंबर, सोमवार को किया जाएगा। शास्त्रों में कहा गया है कि जो भक्त इस दिन विधि-विधान से व्रत करता है और कथा का श्रवण करता है, उसके जीवन के सभी संकट धीरे-धीरे दूर होने लगते हैं।
धर्म ग्रंथों में Saphala Ekadashi Vrat Katha को अत्यंत पुण्यदायी बताया गया है। यही कारण है कि इस दिन कथा सुने बिना व्रत को अधूरा माना जाता है। ROZ KI BAAT के इस लेख में हम आपको सरल और स्पष्ट शब्दों में सफला एकादशी की संपूर्ण व्रत कथा बता रहे हैं।

Saphala Ekadashi Vrat Katha का महत्व
धर्म ग्रंथों के अनुसार वर्ष भर में कुल 24 एकादशी व्रत आते हैं, लेकिन इनमें सफला एकादशी का स्थान विशेष माना गया है। Saphala Ekadashi Vrat Katha स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सुनाई थी। श्रीकृष्ण ने कहा था कि जैसे नागों में शेषनाग, पक्षियों में गरुड़ और ग्रहों में सूर्य व चंद्र श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार सभी एकादशियों में सफला एकादशी श्रेष्ठ है।
शास्त्रों के अनुसार इस दिन व्रत रखने और कथा सुनने से अश्वमेध यज्ञ के समान फल की प्राप्ति होती है। यही वजह है कि भक्तजन इस दिन पूरे श्रद्धा भाव से व्रत रखते हैं और Saphala Ekadashi Vrat Katha का पाठ या श्रवण करते हैं।
सफला एकादशी व्रत की पौराणिक कथा
बहुत समय पहले चम्पावती नाम की एक नगरी हुआ करती थी। इस नगरी में महिष्मान नाम के एक प्रतापी राजा राज्य करते थे। राजा के चार पुत्र थे। इनमें सबसे बड़ा पुत्र लुम्पक स्वभाव से बहुत ही क्रूर, निर्दयी और पापी था। उसके व्यवहार से पूरी प्रजा दुखी रहती थी।
जब राजा महिष्मान को अपने पुत्र के दुर्व्यवहार के बारे में पता चला, तो वे अत्यंत क्रोधित हुए। उन्होंने राज्य की भलाई के लिए लुम्पक को राज्य से निकाल दिया। इसके बाद लुम्पक जंगल में रहने लगा और चोरी करके अपना जीवन यापन करने लगा।
पीपल के वृक्ष के नीचे बदली किस्मत
वन में रहते हुए लुम्पक पशु-पक्षियों की हत्या करके अपना पेट भरता था। जिस जंगल में वह रहता था, वह भगवान विष्णु को अत्यंत प्रिय था। उस वन में एक पवित्र पीपल का वृक्ष था, जिसके नीचे लुम्पक अधिकतर समय बिताता था।
एक बार पौष मास के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि को कड़ाके की ठंड के कारण लुम्पक मूर्छित हो गया। ठंड से उसके हाथ-पैर अकड़ गए और वह पूरी रात उसी अवस्था में पड़ा रहा। अगले दिन जब सूर्योदय हुआ तो वह उठा और भोजन की तलाश में निकल पड़ा।
अज्ञानतावश हुआ एकादशी का व्रत
भोजन खोजते समय उसे कुछ गिरे हुए फल मिले। वह उन फलों को उठाकर फिर से पीपल के वृक्ष के नीचे चला गया। लेकिन वे फल उसे पसंद नहीं आए। दुखी मन से उसने वे फल पीपल के वृक्ष के नीचे रख दिए और कहा,
“हे ईश्वर! यदि आप ही इन फलों से तृप्त हो जाएं।”
उस रात लुम्पक को नींद नहीं आई। इस प्रकार अज्ञानतावश उससे एकादशी का व्रत हो गया। यही दिन Saphala Ekadashi Vrat Katha में सबसे महत्वपूर्ण माना गया है, क्योंकि बिना जाने किए गए इस व्रत से भगवान विष्णु अत्यंत प्रसन्न हो गए।
भगवान विष्णु की कृपा से बदला जीवन
एकादशी व्रत के प्रभाव से लुम्पक के सभी पाप नष्ट हो गए और उसकी बुद्धि शुद्ध हो गई। उसके मन में अच्छे विचार आने लगे। कुछ समय बाद राजा महिष्मान को इस चमत्कार के बारे में पता चला। उन्होंने लुम्पक को बुलाया और उसे पुनः राज्य सौंप दिया।
लुम्पक ने अपने पुराने जीवन को त्याग दिया और भगवान विष्णु का सच्चा भक्त बन गया। वह प्रजा की सेवा करने लगा और न्यायपूर्वक राज्य करने लगा। उसके शासन में प्रजा सुखी और प्रसन्न रहने लगी।
यही कारण है कि Saphala Ekadashi Vrat Katha यह सिखाती है कि सच्चे मन से किया गया व्रत व्यक्ति के जीवन को पूरी तरह बदल सकता है।
Saphala Ekadashi Vrat Katha से मिलने वाला फल
धर्म ग्रंथों के अनुसार जो व्यक्ति सफला एकादशी का व्रत करता है और Saphala Ekadashi Vrat Katha का श्रद्धा पूर्वक श्रवण करता है, उसे जीवन में सफलता, सुख-समृद्धि और शांति प्राप्त होती है। इस व्रत से पूर्वजों के दोष भी शांत होते हैं और परिवार में सकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है।
ROZ KI BAAT
ROZ KI BAAT के अनुसार सफला एकादशी केवल व्रत रखने का दिन नहीं है, बल्कि यह आत्मशुद्धि और जीवन सुधार का अवसर भी है। इस दिन कथा सुनना, भगवान विष्णु का स्मरण करना और संयम का पालन करना अत्यंत फलदायी माना गया है।
Disclaimer
इस आर्टिकल में दी गई जानकारी धर्म ग्रंथों, विद्वानों और पौराणिक मान्यताओं पर आधारित है। ROZ KI BAAT केवल यह जानकारी आप तक पहुंचाने का माध्यम है। यूजर्स इन जानकारियों को केवल सूचना के रूप में ही लें।